सफ़र मंजिल का

सफ़र मंजिल तलक का — नहीं आसान होगा,
बन मुश्किल खड़ा आंधी — कहीं तूफ़ान होगा !

कभी महसूस करोगे अगन है दिल में तुम्हारे,
होगा ऐसा भी कभी — जलता मकान होगा !

नदी तो तैर लोगे तुम समंदर कैसे लांघोगे,
लहरों के सीने में भरा — बड़ा उफान होगा !

सहारे औरों के भला दूर कितना चल लोगे,
भरोसा खुद पर कर लो तुम — तेरा एहसान होगा !

मिलेंगे बहुत तुम्हे राहों में जो थक कर बैठ गए हें,
उलटे पांव का भी पथ पर — कई निशान होगा !

गुजरी होगी क्या उन पर जो तोड़ गए दम राहों में,
हुआ साथ उनके ही दफ़न — उनका अरमान होगा !

दो मजबूती इरादों को बुलंदी साहस को अपने,
मशक्कत-मेहनत भरा जीवन — जरा वीरान होगा !

निकास खुद के सामर्थ्य से नहीं संभव सभी से,
निकस कर देखो तुम न्यारा – तेरा उड़ान होगा !

बेकार न होगा प्रयास किया गया किसी मकसद से,
सफल आज न कल जरूर — तेरा बलिदान होगा !

सफ़र मंजिल तलक का नहीं आसान होगा

बन मुश्किल खड़ा आंधी कहीं तूफ़ान होगा !

Image Source: Pixabay

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Kamlesh Kumar

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Kamlesh Kumar is Copy Editor and Content Writer. During leisure time, while commuting for work, and while traveling, he loves writing poetry.

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