१९४६ नौसैनिक विद्रोह: जब गांधी ने सैनिकों को कहा गुंडा और साहिर लुधयानवी ने मांगा जवाब

नौसैनिक विद्रोह

भारत की आजादी के ठीक पहले मुम्बई (तत्कालिक बॉम्बे) में रायल इण्डियन नेवी के सैनिकों द्वारा पहले एक पूर्ण हड़ताल की गयी और उसके बाद खुला विद्रोह भी हुआ। इसे जलसेना विद्रोह या मुम्बई विद्रोह (बॉम्बे म्युटिनी) के नाम से जाना जाता है। यह विद्रोह १८ फ़रवरी सन् १९४६ को हुआ जो कि जलयान में और समुद्र से बाहर स्थित जलसेना के ठिकानों पर भी हुआ। यद्यपि यह मुम्बई में आरम्भ हुआ किन्तु कराची से लेकर कोलकाता तक इसे पूरे ब्रिटिश भारत में इसे भरपूर समर्थन मिला। कुल मिलाकर 78 जलयानों, 20 स्थलीय ठिकानों एवं 20,000 नाविकों ने इसमें भाग लिया। किन्तु दुर्भाग्य से इस विद्रोह को भारतीय इतिहास मे समुचित महत्व नहीं मिल पाया है।

 

18 अगस्त 1945 को अचानक ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लापता हो जाने के बाद से आज़ाद हिन्द फौज के तमाम सिपाहियों में निराशा छा गयी थी। INA के कई बड़े अधिकारियों और सिपाहियों को बंदी बना लिया गया था। अंग्रेज की फौज में शामिल भारतीय सिपाहियों में इसे लेकर विद्रोह शुरू हो गया था। दूसरी ओर रॉयल इंडियन नेवी में नस्लीय भेदभाव पनप चुका था जो इस घटना के बाद बढ़ गया। 21 अक्टूबर 1945 को आज़ाद हिन्द सरकार के तीसरे स्थापना दिवस पर अंग्रेजी फौज के भारतीय सिपाहियों ने बगावत की रणनीति बनानी शुरू की। लेकिन उनके विद्रोह को दबा दिया गया। लेकिन अंदर ही अंदर अंग्रेजी सेनाओं के अंगों को इसकी भनक लग चुकी थी। अब उनका विरोध तेज़ हो गया था। अपने नस्लीय भेदभाव के लिए लड़ रहे नौसैनिकों की मांगों में अब एक प्रमुख मांग आज़ाद हिन्द फौज के अधिकारियों और सैनिकों पर से मुकदमें वापस लेना और उन्हें रिहा करने की थी। इसी से अंग्रेज को डर लगने लगा। ब्रितानियों ने आभास कर लिया था की अब भारतीय सिपाहियों को रोक पाना मुमकिन नहीं। कम्युनिस्टों का एक बड़ा धड़ा इस विद्रोह के समर्थन में था। कुछ कांग्रेसी भी इसके समर्थन में थे। जबकी वामपंथियों की एक बड़ी जमात और शीर्ष कांग्रेसी जिनमें नेहरू, गांधी, पटेल शामिल थे, इस विद्रोह के खिलाफ थे। धीरे-धीरे विद्रोह पैर पसारने लगा। 18 फरवरी 1946 को इसका असर दिखा।

 

विद्रोह की स्वत:स्फूर्त शुरुआत नौसेना के सिगनल्स प्रशिक्षण पोत ‘आई.एन.एस. तलवार’ से हुई। नाविकों द्वारा खराब खाने की शिकायत करने पर अंग्रेज कमान अफसरों ने नस्ली अपमान और प्रतिशोध का रवैया अपनाया। इस पर 18 फ़रवरी को नाविकों ने भूख हड़ताल कर दी। हड़ताल अगले ही दिन कैसल, फोर्ट बैरकों और बम्बई बन्दरगाह के 22 जहाजों तक फैल गयी। 19 फ़रवरी को एक हड़ताल कमेटी का चुनाव किया गया। नाविकों की माँगों में बेहतर खाने और गोरे और भारतीय नौसैनिकों के लिए समान वेतन के साथ ही आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों और सभी राजनीतिक बन्दियों की रिहाई तथा इंडोनेशिया से सैनिकों को वापस बुलाये जाने की माँग भी शामिल हो गयी। 20 फ़रवरी को विद्रोह को कुचलने के लिए सैनिक टुकड़ियाँ बम्बई लायी गयीं। नौसैनिकों ने अपनी कार्रवाइयों के तालमेल के लिए पाँच सदस्यीय कार्यकारिणी चुनी। लेकिन शान्तिपूर्ण हड़ताल और पूर्ण विद्रोह के बीच चुनाव की दुविधा उनमें अभी बनी हुई थी, जो काफी नुकसानदेह साबित हुई। 20 फ़रवरी को उन्होंने अपने-अपने जहाजों पर लौटने के आदेश का पालन किया, जहाँ सेना के गार्डों ने उन्हें घेर लिया। अगले दिन कैसल बैरकों में नाविकों द्वारा घेरा तोड़ने की कोशिश करने पर लड़ाई शुरू हो गयी जिसमें किसी भी पक्ष का पलड़ा भारी नहीं रहा और दोपहर बाद चार बजे युध्द विराम घोषित कर दिया गया। एडमिरल गाडफ्रे अब बमबारी करके नौसेना को नष्ट करने की धमकी दे रहा था। इसी समय लोगों की भीड़ गेटवे ऑफ इण्डिया पर नौसैनिकों के लिए खाना और अन्य मदद लेकर उमड़ पड़ी।

 

विद्रोह की खबर फैलते ही कराची, कोलकाता, मद्रास और विशाखापत्तनम के भारतीय नौसैनिक तथा दिल्ली, ठाणे और पुणे स्थित कोस्ट गार्ड भी हड़ताल में शामिल हो गये। 22 फ़रवरी हड़ताल का चरम बिन्दु था, जब 78 जहाज, 20 तटीय प्रतिष्ठान और 20,000 नौसैनिक इसमें शामिल हो चुके थे। इसी दिन इस विद्रोह के समर्थन में आये कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेताओं के आह्नान पर बम्बई में आम हड़ताल हुई। नौसैनिकों के समर्थन में शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मजदूर प्रदर्शनकारियों पर सेना और पुलिस की टुकड़ियों ने बर्बर हमला किया, जिसमें करीब तीन सौ लोग मारे गये और 1700 घायल हुए। इसी दिन सुबह, कराची में भारी लड़ाई के बाद ही ‘हिन्दुस्तान’ जहाज से आत्मसमर्पण कराया जा सका। अंग्रेजों के लिए हालात संगीन थे, क्योंकि ठीक इसी समय बम्बई के वायु सेना के पायलट और हवाई अड्डे के कर्मचारी भी नस्ली भेदभाव के विरुध्द हड़ताल पर थे तथा कलकत्ता और दूसरे कई हवाई अड्डों के पायलटों ने भी उनके समर्थन में हड़ताल कर दी थी। कैण्टोनमेण्ट क्षेत्रों से सेना के भीतर भी असन्तोष खदबदाने और विद्रोह की सम्भावना की ख़ुफिया रिपोर्टों ने अंग्रेजों को भयाक्रान्त कर दिया था।

 

ऐसे नाजुक समय में उनके तारणहार की भूमिका में कांग्रेस और लीग के नेता आगे आये, क्योंकि सेना के सशस्त्र विद्रोह, मजदूरों द्वारा उसके समर्थन से राष्ट्रीय आन्दोलन का बुर्जुआ नेतृत्व स्वयं आतंकित हो गया था। मोहम्मद अली जिन्ना की सहायता से सरदार वल्लभ भाई पटेल ने काफी कोशिशों के बाद 23 फ़रवरी को नौसैनिकों को समर्पण के लिए तैयार कर लिया। उन्हें आश्वासन दिया गया कि कांग्रेस और लीग उन्हें अन्याय व प्रतिशोध का शिकार नहीं होने देंगे। बाद में सेना के अनुशासन की दुहाई देते हुए पटेल ने अपना वायदा तोड़ दिया और नौसैनिकों के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात किया। मार्च ’46 में आन्‍ध्र के एक कांग्रेसी नेता को लिखे पत्र में सेना के अनुशासन पर बल देने का कारण पटेल ने यह बताया था कि ‘स्वतन्त्र भारत में भी हमें सेना की आवश्यकता होगी।’ उल्लेखनीय है कि 22 फ़रवरी को कम्युनिस्ट पार्टी ने जब हड़ताल का आह्नान किया था तो कांग्रेसी समाजवादी अच्युत पटवर्धन और अरुणा आसफ अली ने तो उसका समर्थन किया था, लेकिन कांग्रेस के अन्य नेताओं ने विद्रोह की भावना को दबाने वाले वक्तव्य दिए थे। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रान्तीय नेता एस.के. पाटिल और चुन्दरीगर ने तो कानून-व्यवस्था बनाये रखने के लिए स्वयंसेवकों (यहां इसका अर्थ वालंटियर से है, आरएसएस के स्वयंसेवकों से नहीं) को लगाने तक का प्रस्ताव दिया था। जवाहरलाल नेहरू ने नौसैनिकों के विद्रोह का यह कहकर विरोध किया कि ‘हिंसा के उच्छृंखल उद्रेक को रोकने की आवश्यकता है।’ मोहनदास करमचंद गांधी ने 22 फ़रवरी को कहा कि ‘हिंसात्मक कार्रवाई के लिए हिन्दुओं-मुसलमानों का एकसाथ आना एक अपवित्र बात है।’ नौसैनिकों की निन्दा करते हुए उन्होंने कहा कि यदि उन्हें कोई शिकायत है तो वे चुपचाप अपनी नौकरी छोड़ दें। अरुणा आसफ अली ने इसका दोटूक जवाब देते हुए कहा कि नौसैनिकों से नौकरी छोड़ने की बात कहना उन कांग्रेसियों के मुँह से शोभा नहीं देता जो ख़ुद सुविधाएं भोग रहे हैं और विधायिकाओं में जा रहे हैं।

 

नौसेना विद्रोह ने कांग्रेस और लीग के वर्ग चरित्र को एकदम उजागर कर दिया। नौसेना विद्रोह और उसके समर्थन में उठ खड़ी हुई जनता की भर्त्सना करने में लीग और कांग्रेस के नेता बढ़-चढ़कर लगे रहे, लेकिन सत्ता की बर्बर दमनात्मक कार्रवाई के खिलाफ उन्होंने चूँ तक नहीं की। जनता के विद्रोह की स्थिति में वे साम्राज्यवाद के साथ खड़े होने और स्वातन्त्रयोत्तर भारत में साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए वे तैयार थे। जनान्दोलनों की जरूरत उन्हें बस साम्राज्यवाद पर दबाव बनाने के लिए और समझौते की टेबल पर बेहतर शर्तें हासिल करने के लिए थी।

 

यही वह विद्रोह था जिसके बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट रिचर्ड एटली को ब्रिटिश संसद में कहना पड़ा ‘अब भारत में टिक पाना अंग्रेजों के लिए मुश्किल है। अंग्रेजी फौजों के भारतीय सिपाही बागी हो चुके हैं। इसलिए अब उन्हें सत्ता हस्तांतरित करने की घोषणा कर देनी चाहिए।’ इसके बाद ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन जैसा एक सुनियोजित फ्रेम तैयार किया गया। आंदोलन चलता रहा और जनता उसमे मशगूल रही। ब्रिटेन ने बाद में माना कि भारत छोड़ो आंदोलन सफल आंदोलन नहीं था, न ही उसके दबाव में आज़ादी दी गयी है।

 

1946 में नौसैनिक बगावत के सिपाहियों को गाँधी ने ‘सिपाही नहीं गुण्डे’ कहा था, जिस पर बगावती सिपाहियों को गोलियों से भून दिए जाने पर प्रसिद्ध इंक़लाबी शायर ‘साहिर लुधियानवी’ ने एक नज़्म लिखी। उन दिनों वो तराना बन गया। बाद में इस नज़्म में बदलाव कर 1962 में आयी फ़िल्म धर्मपुत्र में एक गीत के तौर पर इस्तेमाल किया गया। अब सभी जगह साहिर का यही गीत मिलता है। मैं यहां मूल नज़्म दे रहा हूँ जो नौसैनिक बगावत के समर्थन में साहिर ने लिखी। शायद साहिर अकेले ऐसे शायर हैं जिन्होंने गांधी से सवाल करने की जुर्रत और हिम्मत की।

 

ए रहबर मुल्को कौम बता, ये किसका लहू है कौन मरा
क्या कौमो वतन की जय गाकर मरते हुए राही गुण्डे थे
जो बागे गुलामी सह न सके वो मुजरिम-ए-शाही गुण्डे थे
जो देश का परचम ले के उठे वो शोख सिपाही गुण्डे थे
जम्हूर से अब नज़रें न चुरा अय रहबर मुल्को कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा ………

 

ये किसका लहू है?
ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम जरा
आँखें तो उठा नजरें तो मिला
कुछ हम भी सुने हमको भी बता
ये किसका लहू है कौन मरा ?

 

धरती की सुलगती छाती के बेचैन शरारे पूछ्तें हैं,
तुम लोग जिन्हें अपना न सके वो खून के धारे पूछते हैं,
सडकों की जबां चिल्लाती है,सागर के किनारे पूछते हैं,

 

ये किसका लहू है कौन मरा,
ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम बता

 

वो कौन सा जज्बा था जिससे फर्सुदा निजामे जीस्त हिला
झुलसे हुए वीरां गुलशन में इक आस उम्मीद का फूल खिला
जनता का लहू फौजों से मिला फौजों का लहू जनता से मिला
ये किसका लहू है कौन मरा,
ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम बता

 

क्या कौमो वतन की जय गाकर मरते हुए राही गुंडे थे ?
जो देश का परचम लेके उठे वो शोख सिपाही गुंडे थे ?
जो बारे-गुलामी सह न सके वो मुजरिमे-शाही गुंडे थे ?
ये किसका लहू है कौन मरा,
ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम बता

 

ऐ अज्मे-फना देने वालो, पैगामे – बका देने वालो!
अब आग से कतराते क्यों हो, शोलों को हवा देने वालो!
तूफान से अब क्यों डरते हो, मौजों को सदा देने वालो!
क्या भूल गये अपना नारा?
ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम बता

 

समझौते की उम्मीद सही, अगियार के वादे ठीक सही ,
हाँ मस्के सितम अफसाना सही, हाँ प्यार के वादे ठीक सही,
अपनों के कलेजे मत छेदो, अगियार के वादे ठीक सही,
जनता से यूँ दामन न छुड़ा ,
ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम बता

 

हम ठान चुके हैं अब जी में हर जालिम से टकरायेंगे ,
तुम समझौते की आस रखो, हम आगे बढ़ते जायेगें,
हर मंजिले-आजादी की कसम, हर मंजिल पर दोहराएंगे.
ये किसका लहू है कौन मरा,
ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम बता.

 

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Abhinav Chauhan

Abhinav Chauhan

Abhinav Chauhan is Deputy Director of International Buddha Education Institute, Sub-Editor of Amar Ujala, Writer, Public Speaker; Poet. Recipient of IBEI-YAC Global Outstanding Peace Activist Award-2017.

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